नाहरगढ़ की रात और पत्थर के चिराग
नाहरगढ़ की रात में पत्थर के चिराग बस रोशनी नहीं देते, एक धीमा-सा मिजाज भी बनाते हैं। ऊपर से जयपुर की बत्तियाँ नीचे चमकती हैं, और हवा ऐसे चलती है जैसे शहर खुद हल्की मुस्कान में हो। यहीं धीमे रोमांस का मजा है: कोई ज्यादा बोलता नहीं, कोई जल्दी नहीं करता। एक तरफ अरावली की ठंडक, दूसरी तरफ छत की दीवार के पास खड़े लोग, और बीच में वह छोटी-सी खामोशी जो बात से ज्यादा काम करती है। घणी सुथरी बात है — जयपुर में प्यार कभी तेज नहीं भागता, बस ठहरकर याद रह जाता है। और हाँ, फोटो का नया कोण मिलते ही जिस का “बस एक और” चल रहा था, वह 27 मिनट तक वहीं अटका रहा।
