पांच बत्ती की शाम, चाय और ट्रैफिक का सीरियल
पांच बत्ती पर शाम होते ही गाड़ियाँ नहीं, कहानियाँ चलने लगती हैं। एक तरफ चाय की टपरी से भाप उठती है, दूसरी तरफ स्कूटर अपनी जगह माँगता रहता है, और संकेत हर बार जैसे थोड़ा सोच कर ही बदलता हो। म्हारे जयपुर में इस वक्त लोग बस निकलते नहीं, नज़र भी घुमाते हैं। कर्ब पर खड़े हो जाओ तो पूरा दृश्य समझ आता है: कोई भैया हेलमेट को कंधे पर लटका कर आगे निकलना चाहता है, कोई दीदी बच्चे को सँभालते हुए हॉर्न से जूझ रही है, और चायवाला सब देख कर भी बिलकुल शांत। यही तो पांच बत्ती का रस है — ट्रैफिक भी, तमाशा भी, और घणी सच्ची शहर-दर्शन की बात भी। समझे?
