पन्ना मीना का कुंड: सीढ़ियाँ और साँस
पन्ना मीना का कुंड आमेर के पास वह जगह है जहाँ आँख पहले खुश होती है और टाँग बाद में जवाब देती है। सीढ़ियाँ एकदम नाप-तोल के साथ बनी हुई लगती हैं, जैसे किसी ने जयपुर की सममिति को पत्थर में लिख दिया हो। पर नीचे उतरते ही समझ आता है कि यह सिर्फ देखने का खेल नहीं, चलने का इम्तिहान भी है। हर मोड़ पर रोशनी अलग पड़ती है, इसलिए एक ही कुंड की तस्वीर तीन तरह की निकलती है। जयपुर वाले इसे ऐतिहासिक बावड़ी बोल देते हैं, पर भाईसाहब, यहाँ तस्वीर से ज़्यादा साँस का हिसाब होता है। म्हारो शहर कभी सीधा जवाब नहीं देता — पहले नज़र फँसाता है, फिर पाँव।
