पन्ना मीना का कुंड: सुबह की सीधी शांति
सुबह पन्ना मीना का कुंड पर पहुँचते ही पहला काम होता है नीचे झाँकना। एक तरफ से उतरती सीढ़ियाँ, दूसरी तरफ से चढ़ती, और बीच में बिलकुल साफ पानी — जयपुर की बनी-बनाई ज्यामिति जैसा। धूप अभी नरम होती है, इसलिए पत्थर का रंग और गहरा लगता है, और हर कोना थोड़ा अलग चमकता है। यहीं इसका मजा है: यह सिर्फ देखने की जगह नहीं, ठहरने की जगह भी है। लोग कम बोलते हैं, बस पैर सँभाल कर चलते हैं। म्हारे जैसे शहर के लोगों को ऐसी ठंडक और सीढ़ियों का हिसाब अपने आप भाता है। वह छोटा-सा साया, जो कार्ड में था, असल में सुबह का पहला झुंड होता है — कुछ लोग फोटो लेते हैं, कुछ बस बैठ कर पानी का हिसाब देखते हैं। घणी शांति, पर जिंदा।
