पन्ना मीना का कुंड: सममिति का तमाशा
पन्ना मीना का कुंड में नीचे उतरते ही पहला एहसास आता है—ठंडक और पैटर्न का। सीढ़ियाँ सीधी नहीं, उलझी हुई-सी लगती हैं, जैसे जयपुर ने ज्यामिति से ज़रा मस्ती कर ली हो। धूप ऊपर रह जाती है, और नीचे छाँह अपना डेरा जमा लेती है। लोग यहाँ सिर्फ पानी देखने नहीं आते, फोटो के लिए आते हैं। हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा खड़ा होता है जैसे अभी पोस्टर बन जाएगा। घणी साफ़ सममिति, घणी मस्त फ़्रेम—और म्हारे जयपुर का वो अंदाज़, जहाँ सुंदरता में भी थोड़ा नाटक ज़रूर होता है। सच्ची, कुंड कम और ज्यामितीय गपशप-गोला ज़्यादा लगता है।
