पतर-गली में जूतों की शाम
पतर-गली में शाम उतरती है तो बाज़ार की रफ़्तार अलग ही हो जाती है। छोटी-छोटी दुकानों के आगे जूतों की कतारें चमक उठती हैं—कहीं स्कूल के काले जूते, कहीं कोल्हापुरी, कहीं सीधे-सादे चमड़े के जोड़े। हवा में पॉलिश और चमड़े की मिली-जुली खुशबू रहती है। यहीं वह पुरानी जयपुर वाली आदत दिखती है: दाम पूछो, फिर थोड़ा सा भाव करो, और आखिर में हाथ मिला लो। एक दुकानदार ने बताया कि जो जोड़े दिन में कम बिकते हैं, शाम को उनकी माँग बढ़ जाती है, क्योंकि कार्यालय से लौटने वाले और बाज़ार घूमने वाले लोग दोनों आते हैं। पतर-गली का यह चमक बस रोशनी का नहीं, रोज़ के जीवन का है—सच्ची, सीधी, और घणी अपनी सी।
