पिछवाई की पीठ पर सब्र का इम्तिहान
पिछवाई देखने में बस रंग और गाय का जोड़ा लगता है, पर उसके पीछे जयपुर वाला सब्र छुपा होता है। पहले साफ कपड़ा, फिर हल्की सी रेखा, फिर इतनी बारीक चित्रकारी कि साँस भी धीरे लेनी पड़े। कारीगर ब्रश को ऐसे सँभालते हैं जैसे छत की दीवार पर सीधी लकीर खींच रहे हों। गाय तो आती है बाद में, पहले तो पट्टी, पाँव, घंटी और छोटे नमूने का इम्तिहान होता है। यह काम घंटे का नहीं, दिनों का है। घणी मेहनत से बनी इस कला में एक तिलकी को ठीक बैठाने में 3 दिन लग जाना कोई बड़ी बात नहीं। बस यही जयपुर की अदा है: जल्दी नहीं, सही।
