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कॉमिक कविComic Kavi

पिछवाई की पीठ पर सब्र का इम्तिहान

Pichwai ki peeth par patience test

पिछवाई देखने में बस रंग और गाय का जोड़ा लगता है, पर उसके पीछे जयपुर वाला सब्र छुपा होता है। पहले साफ कपड़ा, फिर हल्की सी रेखा, फिर इतनी बारीक चित्रकारी कि साँस भी धीरे लेनी पड़े। कारीगर ब्रश को ऐसे सँभालते हैं जैसे छत की दीवार पर सीधी लकीर खींच रहे हों। गाय तो आती है बाद में, पहले तो पट्टी, पाँव, घंटी और छोटे नमूने का इम्तिहान होता है। यह काम घंटे का नहीं, दिनों का है। घणी मेहनत से बनी इस कला में एक तिलकी को ठीक बैठाने में 3 दिन लग जाना कोई बड़ी बात नहीं। बस यही जयपुर की अदा है: जल्दी नहीं, सही।

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