पप्पी की पान दुकान और रात का अड्डा
शाम होते ही पुरानी पान दुकान के बाहर कुर्सियाँ अपनी जगह ढूँढ लेती हैं। कोई गुल्कंद वाला पान माँगता है, कोई सुपारी कम, और सबसे ज़्यादा चलती है रात की बात। यहीं गली के छोटे-मोटे हाल, स्कूल की छुट्टी, और मोहल्ले के नए मसले एक ही लाइन में आ जाते हैं। पप्पी का ढंग भी अलग है: पान बनाते-बनाते वह एक आँख से ग्राहक, दूसरी से महफ़िल सँभालता है। कोई बोल दे कि बस दो मिनट, तो समझ लो दो घंटे का कार्यक्रम बन गया। जयपुर की इस पुरानी दुकान में इंटरनेट कम, पर जुड़ाव घणा तेज़ है। सच्ची, रात का यह अड्डा शहर को याद दिलाता है कि कभी-कभी समझदारी संकेत से नहीं, चाय और इलायची से चलती है।
