रावत की लाइन में सब दार्शनिक
रावत के ठेले के सामने लाइन में खड़े होते ही घणी अजीब सी शांति आ जाती है। पहले आदमी फ़ोन देखते-देखते बकवास करता है, फिर दो मिनट बाद वही कहने लगता है, ‘सच्ची, इंतज़ार का भी अपना मज़ा है।’ जयपुर का ये दृश्य अलग ही दर्जे का है। कचौरी गरम मिलती है, पर उससे पहले सबका मिज़ाज ठंडा हो चुका होता है। कोई घड़ी देखता है, कोई आगे वाले की टोकरी, और कोई बस खुश कि लाइन चल रही है। मज़ा तब आता है जब 17 मिनट बाद एक भैया बोलते हैं, ‘म्हारे लिए दो और रख देना।’ बस, इंतज़ार ने उनको भी दार्शनिक से नियमित ग्राहक बना दिया।
