रावत की लाइन में सब्र का डिप्लोमा
रावत के बाहर सुबह से ही लाइन सीधी नहीं, थोड़ी टेढ़ी चलती है—बिलकुल जयपुर की आदत जैसी। एक हाथ में पर्ची, दूसरे में पेट की आवाज़। पहले लगता है बस कचौरी का इंतज़ार है, पर थोड़ी देर बाद समझ आता है कि यह सब्र की कक्षा है। आगे खड़े भाई साहब ने 12 मिनट में फ़ोन, घड़ी और भूख, तीनों का अंदाज़ा लगा लिया। यहीं पता चलता है कि रावत के आगे खड़ा होना सिर्फ खाना लेना नहीं, अपने गुस्से को गरम तेल में हल्की आँच पर रखना है। घणी भूख हो, तब भी आदमी दूसरे के लिए जगह छोड़ देता है। जयपुर में कचौरी मिलती है, पर उससे पहले जो तहज़ीब मिलती है, वही असली नाश्ता है।
