सांगानेर का बंधेज: एक गाँठ, एक रंग
सांगानेर के घरों और छोटी कारखानों में बंधेज का काम सिर्फ कपड़ा रंगना नहीं, एक धैर्य भरी कला है। रेशम या मुलमुल पर पहले धागे से बारीक गाँठें बाँधी जाती हैं, फिर कपड़ा रंग में डुबोया जाता है। जहाँ गाँठ होती है, वहाँ सफेदी बच जाती है; इसी से छोटे बिंदु, फूल और लहरिया जैसी धार बनती है। जयपुर की दुकानों में ये दुपट्टे और ओढ़नियाँ त्योहार, शादी और रोज के सज-धज दोनों में पहनी जाती हैं। घणी मेहनत के बाद जब गाँठ खुलती है, तब रंग का जादू दिखता है — सच्ची, जैसे कपड़े ने अपनी कहानी खुद सुना दी हो। सांगानेर की यही पहचान है: हाथ की पकड़, रंग की मार, और एक नरमी जो दूर से भी पहचानी जाती है।
